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 पैगंबर हज़रत मुहम्मद के समर्थन की वेबसाइट - नमाज़ के बाद की सुन्नतें



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Knowing Allah
  
  

 

 

नमाज़ के बाद की सुन्नतें:

 

1 - तीन बार अल्लाह से क्षमा मांगना, और यह दुआ पढ़ना:

"اللهم أنت السلام ومنك السلام تباركت يا ذا الجلال والإكـرام"

"अल्लाहुम्मा अन्तस्-सलामु वा मिन्कस्-सलामु, तबारक्ता या ज़ल-जलालि वल-इकराम"

(हे अल्लाह तू ही शांति है और तुझ ही से शांति है, तू बरकत वाला है हे महिमा और सम्मान वाला l) इसे इमाम मुस्लिम ने उल्लेख किया है l 

२- और यह दुआ पढ़ना भी सुन्नत है :

(لا إله إلا الله وحده لا شريك له ، له الملك وله الحمد وهو على كل شيء قدير، اللهم لا مانع لما أعطيت ولا معطي لما منعت ولا ينفع ذا الجد منك الجد)

"ला इलाहा इल्लल्लाहु वह्दहु ला शरीक लहु, लहुल-मुल्कु व लहुल-हमदु व हुवा अला कुल्लि शैइन क़दीर, अल्लाहुम्मा ला मानिआ लिमा अअतैता वला मुअतिया लिमा मनअता वला यनफ़उ ज़ल-जद्दि मिन्कल-जद्द l" (अल्लाहको छोड़ कर कोईपूजे जाने के योग्य नहींहै, अकेला है उसका कोई साझी नहीं हे, उसी का राज है और उसी केलिए सारी प्रशंसा है और वही सब चीज़ पर शक्तिशाली है, हे अल्लाह! जो तू दे उसे कोई रोकने वाला नहीं, और जिसको तू रोक दे उसे कोई देने वाला नहीं, तेरे पास सम्मान वाले का सम्मान कुछ काम नहीं देता l) इसे इमाम बुखारी और इमाम मुस्लिम ने उल्लेख किया है l

३- और यह दुआ पढ़ना भी सुन्नत में शामिल है:

 ( لا إله إلا الله وحده لا شريك له ، له الملك وله الحمد وهو على كل شيء قدير ، لا حول ولا قوة إلا بالله ، لا إله إلا الله ولا نعبد إلا إياه له النعمة وله الفضل وله الثناء الحسن ، ولا إله إلا الله مخلصين له الدين ولو كره الكافرون)

 

"ला इलाहा इल्लल्लाहु वह्दहु ला शरीक लहु, लहुल-मुल्कु व लहुल-हमदु व हुवा अला कुल्लि शैइन क़दीर,ला हौला वला कुव्वता इल्ला बिल्लाहला इलाहा इल्लल्लाहु वला नअबुदु इल्ला इय्याहु लहुन्-निअमतु व लहुल-फज़लु व लहुस्-सनाउल-हसन्, व ला इलाहा इल्लल्लाहु मुखलिसीना लहुद-दीना व लौ करिहल-काफिरून"

(अल्लाहको छोड़ कर कोईपूजे जाने के योग्य नहींहै, अकेला है उसका कोई साझी नहीं हे, उसी का राज है और उसी केलिए सारी प्रशंसा है और वही सब चीज़ पर शक्तिशाली है,और न कोई शक्ति है और न कोई बल है मगर अल्लाह ही से, अल्लाहको छोड़ कर कोईपूजे जाने के योग्य नहींहैऔर हम उसे छोड़ कर किसी और की पूजा नहीं करते हैं, उसी केलिए उदारता है और उसी के लिए बड़ाई है और उसी केलिए अच्छी प्रशंसा है,अल्लाहको छोड़ कर कोईपूजनीय नहींहै, हम साफ़दिली से उसी की फर्माबरदारी करते हैं यद्यपि काफ़िरों को बुरा लगे) इसे इमाम मुस्लिम ने उल्लेख किया है l   
४ इसी तरह तेंतीस (३३) बार यह दुआ पढ़ना भी सुन्नत है:

 

"سبحان الله ، والحمد لله ، والله أكبر"

"सुब्हानल्लाह, वल-हम्दुलिल्लाह, वल्लाहु अक्बर"

(ख़ूब पवित्रता है अल्लाह के लिए, और प्रशंसा है अल्लाह के लिए, और अल्लाह बहुत बड़ा है l)

साथ ही यह दुआ पढ़े:

"لا إله إلا الله وحده لا شريك له ، له الملك وله الحمد وهو على كل شيء قدير"

"ला इलाहा इल्लल्लाहु वह्दहु ला शरीक लहु, लहुल-मुल्कु व लहुल-हम्दु व हुवा अला कुल्लि शैइन क़दीर l"

(अल्लाहको छोड़ कर कोईपूजे जाने के योग्य नहींहै, अकेला है उसका कोई साझी नहीं हे, उसी का राज है और उसी केलिए सारी प्रशंसा है और वही सब चीज़ पर शक्तिशाली है l) इसे इमाम मुस्लिम ने उल्लेख किया हैl     
    

५ –इसी प्रकार यह दुआ पढ़ना भी सुन्नत है:

"اللهم أعني على ذكرك، وشكرك، وحسن عبادتك"

"अल्लाहुम्मा अइन्नी अला ज़िक्रिका व शुक्रिका व हुस्नि इबादतिक्"

(हे अल्लाह!मेरीमदद कर तुझे याद करने पर, और तेरे धन्यवाद पर, और अच्छी तरह से तेरी पूजा करने पर l) इसे अबू-दाऊद और नसाई ने उल्लेख किया है l
6 – नमाज़ के बाद यह दुआ पढ़ना भी सुन्नत में शामिल है:

"اللهم إني أعوذ بك من الجبن ، وأعوذ بك أن أرد إلى أرذل العمر ، وأعوذ بك من فتنة الدنيا " وأعوذ بك من عذاب القبر

"अल्लाहुम्मा इन्नी अऊज़ु बिका मिनल-जुब्नि, व अऊज़ु बिका मिन् अन् उरद्दा इला अरज़ालिल-उमरि, व अऊज़ु बिका मिन फितनतिद-दुन्या, व अऊज़ु बिका मिन अज़ाबिल-क़ब्र"  (हे अल्लाह!मैं तेरी शरण मे आता हूँ कायरता से,  और मैं तेरी शरण मे आता हूँ अपमानजनक बुढ़ापे में डाले जाने से,  और मैं तेरी शरण मे आता हूँ दुनिया के परीक्षण से, और मैं तेरी शरण मे आता हूँ क़ब्र की पीड़ा से l) इसे इमाम बुखारी ने उल्लेख किया है l

७- इसी तरह सुन्नत दुआओं में यह दुआ भी शामिल है:

 

"رب قني عذابك يوم تبعث عبادك"

"रब्बि क़िनी अज़ाबका यौमा तब्असु इबादक्"

(हे मेरे पालनहार! तू मुझे उस दिन अपनी पीड़ा से बचा जब तू अपने दासों को उठाएगा) क्योंकि हज़रत बरा के द्वारा उल्लेखित है कि उन्होंने कहा:जब हम अल्लाह के पैगंबर-उन पर इश्वर की कृपाऔर सलाम हो-के पीछे नमाज़ पढ़ते थे, तो हमारी इच्छा यही होती थी कि हम उनकी दहिनी तरफ रहें, तो वह हमारी तरफ चेहरा करते थे, तो मैंने उन्हें यह पढ़ते सुना:

 

"رب قني عذابك يوم تبعث - تجمع- عبادك"


"रब्बि क़िनी अज़ाबका यौमा तब्असु-तज्मउ-इबादक्"

(हे मेरे पालनहार! तू मुझे उस दिन अपनी पीड़ा से बचा जब तू अपने बन्दों को उठाएगा यानी जमा करेगा) इसे इमाम मुस्लिम ने उल्लेख किया है l 
 8 –इन्ही सुन्नतों में सूरह " क़ुल हुवल्लाहु अहद" पढ़ना भी शामिल है , इसी तरह क़ुल अऊज़ु बि-रब्बिल- फलक़ " पढ़ना, और " क़ुल अऊज़ु बिरब्बिन-नास" पढ़ना भी सुन्नत है lइसे अबू- दाऊद , तिरमिज़ीऔर नसाई ने उल्लेख किया है l

•  फजर और मग़रिब की नमाज़ के बाद इन सूरों को तीन तीन बार दोहराना चाहिए l
9 –"आयतल-कुर्सी" यानी अल्लाहु ला इलाहा इल्ला हुवल- हय्युल-क़य्यूम, पढ़ना चाहिए lइसे इमाम नसाई ने उल्लेख किया है l

१० - और फजर और मग़रिब की नमाज़ के बाद यह दुआ पढ़ना भी सुन्नत है:

 

"لا إله إلا الله وحده لا شريك له ، له الملك وله الحمد يحي ويميت وهو على كل شيء قدير "

"ला इलाहा इल्लल्लाहु वह्दहु ला शरीक लहु, लहुल-मुल्कु व लहुल-हम्दु युहयी व युमीत व हुवा अला कुल्लि शैइन क़दीरl"

(अल्लाहको छोड़ कर कोईपूजे जाने के योग्य नहींहै, अकेला है उसका कोई साझी नहीं हे, उसी का राज है और उसी केलिए सारी प्रशंसा है, वही ज़िंदा करता है और मौत देता है,  और वही सब चीज़ पर शक्तिशाली है l)इसे इमाम तिरमिज़ी ने उल्लेख किया है l



11 –याद रहे कि ज़िक्र और तस्बीह को हाथ पर गिनना भी सुन्नत है, और एक रिवायत में तो है कि दाहिने हाथ पर गिनना चाहिए लेकिन उसमे विवाद है, भले ही दूसरे आम सबूतों से इसी कीपुष्टि होती है l 
12 –इन दुआओं को उसी स्थान पर रह कर पढ़े जहाँ नमाज़ पढ़ी हो, बिना जगह को बदले l

•  इन सुन्नतों की कुल संख्या लगभग ५५ होती है , जिनको एक मुस्लमान व्यक्ति प्रत्येक फ़र्ज़ नमाज़ के बाद अदा करने का प्रयास करता है, इस की संख्या फजर और मग़रिब की नमाज़ में बढ़ भी सकती है l

 
 प्रत्येक फ़र्ज़ नमाज़ के बाद इस सुन्नत पर अमल करने और उसकी पाबंदी करने के परिणाम:
क) यदि एक मुसलमान व्यक्ति रात-दिन की नमाजों के बाद इन आराधनाओं और विनतियों को पाबंदी से पढ़ेगा तो उसके लिए ५०० दान का पुण्य लिखा जाएगा lक्योंकि अल्लाह के पैगंबर-उन पर इश्वर की कृपाऔर सलाम हो-का फ़रमान है: " प्रत्येक सुब्हानल्लाह" पवित्रता है अल्लाह के लिए एक दान है,  और प्रत्येक "अल्लाहु अक्बर"(अल्लाह बहुत बड़ा है) एक दान है, और प्रत्येक "अलहम्दुलिल्लाह" (सभी प्रशंसा अल्लाह के लिए  है) एक दान है, और प्रत्येक "ला इलाहा इल्लाहू" (अल्लाह को छोड़ कर कोई पूजनीय नहीं है) एक दान है" lइसे इमाम मुस्लिम ने उल्लेख किया है l 

•इमाम नववी ने कहा: दान होने का मतलब यह है कि दान देने के जैसा पुण्य प्राप्त होगा l
ख) यदि एक मुसलमान व्यक्ति रात-दिन की नमाजों के बाद इन आराधनाओं और विनतियों को पढ़ने का प्रयास करेगा तो उसके लिए स्वर्ग में 500 पेड़ लगा दिए जाएंगे, क्योंकि अल्लाह के पैगंबर-उन पर इश्वर की कृपाऔर सलाम हो-एक बार हज़रत अबू-हुरैरा के पास से गुज़रे जब वहएक पौधा लगा रहे थे तोउन्होंने कहा: (हे अबू-हुरैरा! क्या मैं तुम्हें इस पौधे से बेहतर पौधे के विषय में न बताऊँ? तो उन्होंने कहा: क्यों नहीं हे अल्लाह के पैगंबर! इस पर उन्होंने कहा: यह पढ़ा करो:

"سبحان الله والحمد لله ولا إله إلا الله والله أكبر"

 

"सुब्हानाल्लाहि वल-हम्दुलिल्लाहि, वला इलाहा इल्लल्लाहु वल्लाहु अक्बर" (पवित्रता है अल्लाह के लिए, और सारी प्रशंसा है अल्लाह ही के लिए, अल्लाह को छोड़कर कोई पूजनीय नहीं है, और अल्लाह बहुत बड़ा है l) यदि यह पढ़ोगे तो प्रत्येक के बदले में तुम्हारे लिए स्वर्ग में एक पेड़ लगा दिया जाएगा lइसे इब्ने-माजा ने उल्लेख किया है, और अल्बानी ने इसे सहीह और विश्वसनीय बताया है l

ग) यदि एक व्यक्ति इसे पढ़ता है तो उसके और स्वर्ग के बीच मौत के सिवाय और कोई रुकावट नहीं रहता है बस मरते ही स्वर्ग में प्रवेश कर जाएगा, यह उसके लिए है जो प्रत्येक नमाज़ के बाद , आयतल-कुर्सी पढ़ता है और उसका ख्याल रखता है l

घ) जो इन दुआओं को लगातार पढ़ता है तो उसके पापों को मिटा दिया जाता है भले ही वे समुद्र के झाग की तरह हों lजैसा कि इमाम मुस्लिम की "सहीह" नामक पुस्तक में उल्लेखित है l
ङ) जो भी प्रत्येक नमाज़ के बाद , इन दुआओं को पढ़ता है और उसका ख्याल रखता है तो वह न दुनिया में और न ही आखिरत में अपमान अथवा नाकामी का कभी मुंह देखेगा, क्योंकि शुभ हदीस में है: वे उसके लिए सुरक्षा करने वाले बन जाते हैं, और उनका पढ़ने वाला कभी विफल नहीं होता है lइसे इमाम मुस्लिम ने उल्लेख किया हैl

च) इस के द्वारा फ़र्ज़ में हुई कमी-बैशी का भुगतान हो जाता है l 






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